वाह री गोदी मीडिया निज़ामुद्दीन मरकज़ में मुसलमान छुपे हुए हैं और अयोध्या मंदिरों में श्रद्धालु फँसे हुए हैं
March 31, 2020 • Waseem Akram Tyagi

आख़िरकार भारतीय मीडिया को वह कामियाबी मिल ही गई जिसकी उसे बीते सप्ताह से तलाश थी। अब कोरोना का ठीकरा 'निज़ामुद्दीन' पर फोड़ा जा रहा है। मीडिया सवाल नहीं उठाएगा, बल्कि ज़िम्मेदारी तय करेगा, कोरोना का ठीकरा फोड़ने के लिए वही सर मिल गया जिस पर किसी भी तरह का इलजाम लगाना 'राष्ट्रभक्ती' माना जाता है। अब यह सवाल नहीं होगा निज़ामुद्दीन मरकज़ ने तो 25 मार्च को ही प्रशासन को पत्र लिखकर बताया था कि मरकज से 1500 लोगों को भेजा जा चुका है मगर करीब 1000 लोग अभी भी वहां फंसे हैं, जिसके लिए वाहन पास जारी किए जाएं, साथ वाहनों की सूची भी लगाई गई थी मगर प्रशासन ने वाहन पास जारी नहीं किए। लेकिन इन सवालों से मतलब ही किसे है? जब मीडिया ने क़सम खाई हो कि मुसलमानों को ही इस देश की सबसे बड़ी समस्या साबित करना है तब तार्किता से उठाए गए जायज सवाल भी अपने मायने खो देते हैं। 
बीती शाम ख़बर आई थी कि मरकज़ पर मुक़दमा दर्ज किया गया है। अब ज़रा गर्दन घुमाईए, और दो दिन पहले तक आनंद विहार बस अड्डे की तस्वीरों को देखिए हजारों की संख्या में मौजूद मजदूर दिल्ली से पलायन करने के लिए बसों के इंतजार में खडे रहे, इसका ज़िम्मेदार कौन है? क्या सरकार जिम्मेदार है? या फिर वे मकान मालिक जिम्मेदार हैं जिन्होंने इन मजदूरों को पलायन करने से नहीं रोका? क्या उन मकान मालिकों पर मुक़दमा दर्ज नहीं होना चाहिए? क्या सरकार इसकी ज़िम्मेदारी लेगी?

भारत में कोरोना से मरने वालों की संख्या अभी 32 है, लेकिन लाॅकडाउन की वजह से पैदल ही अपने गांवों को पलायन करने वाले जिन मजदूरों की अलग अलग हादसे में जान गई है उसकी संख्या 35 हो गई है। इसका ज़िम्मेदार कौन है? 

मीडिया किस बारीकी से शब्दों से खेल रहा है उसे समझिए, मीडिया के मुताबिक़ मरकज़ में लोग 'छिपे' हुए हैं, लेकिन अयोध्या स्थित मंदिरों में श्रद्धालू 'फंसे' हुए हैं। दरअस्ल यह बोद्धिक आतंकवाद है। भारतीय मुसलमान इस देश का ऐसा अल्पसंख्यक समुदाय है जिसके सर पर हर एक नाकामी का ठीकरा आसानी से फोड़ दिया जाता है, जिस पर आरोप लगाना देशभक्ती है, और गाली देना राष्ट्रभक्त होने का सबूत है। कोरोना इस देश में उतनी तबाही नहीं मचा सकता जितनी तबाही भारतीय मीडिया और एक राजनीतिक विशेष महज एक महीने में मचा देता है। महज़ लाशें गिरना ही तबाही मचाना नहीं है, बल्कि किसी एक समुदाय के लोगों से दूसरे समुदाय के लोगों को आतंकित करना भी तबाही है। लेकिन यह तबाही लगातार जारी है, निज़ामुद्दीन मरकज़ से तबाही का एक और मौक़ा मिला है। जो कोरोना जैसी महामारी से भी अधिक ख़तरनाक है।
Wasim Akram Tyagi✍✍