मौजूदा हालात में इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेण्टर की अहमियत
November 3, 2019 • कलीमुल हफ़ीज़

हमारा प्यारा देश इस समय जिन हालात का शिकार है उन हालात को हर समझदार आदमी अच्छी तरह जानता है। भारत की हज़ारों साल की तहज़ीबी विरासत दाँव पर लगी हुई है। भाईचारे को नफ़रत के देव ने निगल लिया है। मगर हालात इतने भी ख़राब नहीं हैं कि तब्दील न किये जा सकते हों। हालात को बदलने के लिये आज मिल्ली इदारे, मज़हबी जमाअतें, दीनी दर्सगाहें जो काम कर रही हैं वो क़ाबिले-क़द्र और सराहनीय है। मगर उनका दायरा महदूद और सीमित है। उनपर मुस्लिम क़ौम-परस्ती का लेबल लगा हुआ है। रही सियासी लीडरशिप, वो भी हाशिये पर (Marginalized) है। मेरे ख़याल में इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेण्टर (लोधी रोड, नई दिल्ली) की हैसियत एक क़ौमी इदारे की है। इसके मेम्बर्स में हर मसलक और हर मज़हब और हर मुक़ाम के लोग शामिल हैं, इसका हर मेम्बर अपनी जगह एक इदारा (संस्था) है, इसके मेम्बर्स हर अस्बियत (पक्षपात) से दूर हैं। वो हुकूमती इदारों में भी असरो-रुसूख़ (प्रभाव) रखते हैं। इसलिये वे इस समय तारीख़ी रोल अदा कर सकते हैं। कुछ दिन बाद ही सेण्टर की जनरल बॉडी की सालाना मीटिंग होने वाली है। मैं समझता हूँ कि सेंटर के ज़िम्मेदारान मुल्क के मौजूदा हालात में मुसलमानों की तरक़्क़ी, ख़ुशहाली और मुल्क की एकता व सालमियत के लिये ज़रूर कोई मंसूबाबन्दी करेंगे। इस सिलसिले में एक किताब पिछले साल नवम्बर में मैंने पब्लिश की थी। उसमें कुछ तजवीज़ें (प्रस्ताव) पेश की थीं। उसे बड़े पैमाने पर तक़सीम किया गया था, मगर अफ़सोस है कि सेण्टर के किसी ज़िम्मेदार ने भी उसे तवज्जोह के क़ाबिल नहीं समझा। एक बार फिर उस किताब की कॉपी सदरे-मोहतरम (माननीय अध्यक्ष) और सेक्रेट्री साहब की ख़िदमत में भेज दी गई है। उम्मीद है कि वो इसको AGBM में ग़ौर-फ़िक्र के लिये पेश करेंगे। मुख़्तसर तौर पर (संक्षेप में) वो तजवीज़ें पाठकों की ख़िदमत में पेश की जा रही हैं। इस उम्मीद के साथ कि अगर ये तजवीज़ें किसी क़ाबिल हों तो वे उनकी ताईद करेंगे।
सेण्टर की वास्तविक हैसियत की बहाली हक़ीक़त ये है कि हम इस इदारे की हक़ीक़ी हैसियत से अन्जान हैं। हम ये समझते हैं कि ये कोई फ़न्क्शन-हॉल है, ये कोई मुशायरा करनेवाली अदबी अन्जुमन है, ये कोई मोहल्ले की सोसाइटी है, ये एक अच्छा रेस्टोरेंट है जहाँ लज़ीज़ पकवान हैं या ये कॉफ़ी-हाउस है जहाँ बैठकर ख़ुशगप्पियाँ की जा सकती हैं। सेण्टर की वास्तविक हैसियत का तक़ाज़ा है कि इसे पूरे मुल्क का इदारा बनाना चाहिये। सेण्टर से जुड़े लोग जहाँ-जहाँ रहते हैं उनको इस सेण्टर के नुमाइन्दे की हैसियत देना चाहिये। इससे सेण्टर को अफ़रादी (व्यक्तिक) क़ुव्वत हासिल होगी। एक कैडर मिल जाएगा, जो सेण्टर के प्रोग्राम को लागू करने में मददगार व सहायक होगा।
रिसर्च सेण्टर (Think Tank) का क़ियाम (स्थापना)
मुल्क के पढ़े-लिखे और एक्सपर्ट का तक़र्रुर (चयन) करके एक थिंक टैंक (Think Tank) बनाया जाए, उसका असल काम मिल्लत की ज़रूरत को समझना और हुकूमत की पॉलिसी व प्रोग्राम को मिल्लत तक पहुँचाना हो, ये थिंक टैंक मिल्लत की ज़रूरतों का जायज़ा (समीक्षा) ले और सरकारी स्कीमों और सरकार की पॉलिसी का भी मुताला (अध्ययन) करे और अपने जायज़े और मुताले की रौशनी में क़ाबिले-अमल और नतीजाख़ेज़ लाहियाए-अमल (पारिणामिक रणनीति) बनाए, हुकूमत की स्कीमों को जनता तक पहुँचाने का रोडमेप बनाया जाए। उन शोबों और विभागों से सम्बन्धित तहक़ीक़ाती सरगर्मियों (research activities) और रहनुमाई से मुताल्लिक़ मज़ामीन पर मुश्तमिल (आधारित) Monthly Journal पब्लिश किया जाए। ये थिंक टैंक निम्नलिखित शोबों (विभागों) में ख़ास तौर पर काम करे।


1. इस्लाम की इशाअत और ग़लतफ़हमियों का इज़ाला (निवारण)
2. इस्लामी तहज़ीब (संस्कृति) की बक़ा व तहफ़्फ़ुज़ (protection)
3. माइनॉरिटी इशूज़ (अल्पसंख्यकों के मसले)
4. तालीम व तरबियत (Education and Training)
5. मीडिया
6. सेहत व सफ़ाई (Health and Cleanliness)
7. ग़ुरबत का ख़ात्मा और रोज़गार दिलाना
8. औक़ाफ़ का तहफ़्फ़ुज़ और उसका सही इस्तेमाल
9. सिनअत व तिजारत (Industry and business)
10. खेती
इन शोबों में तफ़्सीली प्लानिंग की जाए, इनमें से कुछ काम तो सिर्फ़ इन्फ़ॉरमेशन की हद तक होंगे। बहुत-से कामों के लिये सिर्फ़ हुकूमती दफ़्तरों (कार्यालयों) को ख़त लिखना होगा, कुछ काम सेमीनार और सिम्पोज़ियम के ज़रिए अंजाम पाएँगे। कुछ कामों के लिये वर्कशॉप और कैम्प लगाने होंगे और कुछ काम ऐसे भी होंगे जिनके लिये बहुत-से बुनियादी काम करने होंगे। मेम्बर्स की तादाद और सलाहियत को सामने रखिये तो ये काम नामुमकिन (असम्भव) नहीं हैं।