मैं हूँ कोरोना
April 7, 2020 • Neeraj Tomar

मैं कोरोना हूँ उर्फ़ कोविड-19। आजकल सुबह उठने से रात को सोने तक बस मेरा ही जिक्र और मेरी ही चर्चा है। ऐसा लग रहा है कि लोग कुछ ज़्यादा ही मुझसे प्यार करने लगे हैं। मैं विदेशी हूँ, यह तो सभी जानते हैं और विदेशियों के प्रति आकर्षण भी स्वभाविक है। वस्तुतः इसीलिए इतना प्रेम और स्नेह मुझे मिल रहा है। हालांकि कुछ लोग मुझे पसंद नही कर रहे और धीरे-धीरे उनकी तादाद भी बढ़ती जा रही है। पर मैं दूसरों की पसंद की परवाह नही करता।
मैं चीन से आया हूँ। यद्यपि चाइनीज माल की कोई गारंटी नही है, किन्तु मेरी गारंटी पूरी-पूरी है कि यदि आप थोड़े से भी कमजोर मेरे सामने रहे, तो बस लोगों की यादों में ही रह जाएंगे। मैं प्रभावशाली हूँ, उच्छृंखल हूँ। इसका प्रमाण मैं कई देशों में दे चुका हूँ। इसके बावजूद कई लोग मेरा उपहास उड़ा रहे हैं। मुझ पर लतीफ़े बना रहे हैं। बिल्कुल भी गम्भीरता ही नही है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मेरे वजूद की चुनौती को स्वीकारा गया है। मेरा नाम इतने उच्च स्तर पर भी प्रख्यात (कुख्यात) हो गया है। फिर भी कुछ लोग मेरे अस्तित्व से घबरा नही रहे हैं। बस यही तो कोफ़्त है मुझे। यही तो नही भा रहा। जिन कारणों एवं उद्देश्यों से मेरा जन्म हुआ है, ऐसे लोग मुझे उन्हें पूर्ण करने का अवसर प्रदान कर रहे हैं। इनके इस सहयोग का बहुत आभारी हूँ मैं। इनकी यह निर्भीकता मुझे उकसाती है। मुझे प्रेरित करती है अपना प्रभुत्व, अपना खौफ़ कायम रखने के लिए।
अब देखो! ये इनकी नादानी कहूँ या अपनी खु़शकिस्मती कि मेरे संदेह होने मात्र् से ये लोग अस्पतालों से भाग रहे हैं। विचित्र मूर्खता है। बीमार होने पर इलाज कराया जाता है या अस्पतालों से भाग दूसरों को भी संक्रमित किया जाता है! इसमें कौन-सी बुद्धिमानी है, मेरी समझ से परे है। इन इंसानों को समझना मुझे समझने से भी अधिक जटिल है। मुझे दोष देते हैं कि मैं अनियंत्रित हो सबको परेशान कर रहा हूँ और स्वयं ‘मूविंग बम’ बने घूम रहे हैं। मैंने तो मौका दिया है मुझसे पीछा छुड़ाने का। बैठो घर पर। बचे रहो मुझसे। पर ये तो इंसान है ना! लोभी, आरामप्रस्त, स्वार्थी....... घर बैठने का अवसर दिया, तो चल दिए पिकनिक मनाने। अब यदि मैं तुम्हारा आलिंगन करता हूँ, तो दोषी तो तुम स्वयं हो।
तुम इंसानों को तो मुझे धन्यवाद देना चाहिए कि विश्वपटल पर मैंने सबको संगठित कर दिया है। विभिन्न प्रकार की लड़ाइयाँ, खींचातानी, अधिकार-कर्तव्य सब बेमानी हो गए। ‘जान है तो जहान है’, बस यही बात सबको समझाने में मेरा महत्त्वपूर्ण योगदान है। एक बात तो पूर्णतः स्पष्ट हो गई है कि सभी प्रलोभन ‘जीवन’ के रहते ही औचित्यपूर्ण है। जीवन ही नही तो क्या मायने इन ‘ख़्वाहिशों’ के? 
पर इस पर भी कुछ लोग हैं जिनका जीवन-दर्शन बहुत अद्भुत है। उन्हें अपने व्यापार में हानि की बहुत चिंता है। वे निरंतर प्रयासर्त है, इस संकट की घड़ी में अपने व्यापार को बचाने एवं बढ़ाने के लिए। इसके लिए वे अपने प्राणों की आहुति देने एवं दूसरों के प्राणों की भी आहुति देने से संकुचाते नही हैं। ऐसे कर्मठ लोग मुझेे बहुत प्रिय हैं। उनकी अज्ञानता मेरी वाहक है। मेरी चहेती ‘टूरिस्ट गाइड’। मुझे सर्वव्यापी करने में सहायक।


वैसे लोगों को मेरा शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि मैं उन्हें विभिन्न प्रकार के नवीन ‘आइडियाज़’ दे रहा हूँ। कभी सोचा होगा किसी ने कि ‘वर्क फ्राॅम होम’ जैसा भी कुछ हो सकता है। हालांकि बहुत लोग पहले से ही इसे करते आ रहे हैं, पर क्या इतने बड़े स्तर पर यह सब! कितना अच्छा है ना! क्या तुम इसके फ़ायदे जानते हो? इससे सड़क पर रोज़ सुबह होती परेड एवं भागमभाग से निजात मिली है। जिसके कारण वाहनों का आवागमन कम हुआ है और प्रदूषण का स्तर भी घटा है। और तो और जाने-आने का अनावश्यक खर्च भी बच गया है। आॅफ़िस में बिजली-पानी जैसे अनेक व्यय जो कर्मचारियों पर होते हैं, सब कम हो गए हैं। और काम तो हो ही रहे हैं। कर्मचारियों का भी जो समय आने-जाने में बर्बाद होता था, उस समय का सदुपयोग किसी अन्य कार्य को सम्पन्न करने में किया जा सकता है। शारीरिक कष्टों से भी मुक्ति मिल रही है। एक स्वस्थ शरीर में की स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। इससे कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ती है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिन कार्याें को सरलतापूर्वक घर से ही करते हुए इतनी बचत की जा सकती है, तो क्यों न मेरे बाद भी उन कार्योें को आगे भी इसी प्रकार किया जाए, जिससे उन बचतों का उपयोग कर और अधिक उत्पादन बढ़ाया जा सके। 
इंसान को अब अपना नजरिया बदलने का समय आ गया है। इलेक्ट्राॅनिक होती इस दुनिया को बर्बाद होने से बचाने का समय। अब गम्भीर होकर सबको सोचना होगा कि मेरा जन्म क्यों हुआ है? मैं किसी देश की खु़राफ़ात नही हूँ। मैं ‘बदला’ हूँ प्रकृति का। उस प्रकृति का जिसने तुम्हें माँ जैसा दुलार दिया, जिसने तुम्हें आसरा दिया, जीवन दिया, सौन्दर्य दिया, नैसर्गिकता दी। और तुमने क्या किया? बदले में तुमने उसे छलनी कर दिया। अपने स्वार्थ में उसका अंधाधुंध दोहन किया। उसके बनाए जीवों की हत्या की। उस पर जनसंख्या रूपी वजन को बढ़ाया। प्रदूषण से उसका दम घोट दिया। उसे असहनीय कष्ट दिए। पर तुम्हें कभी उसके कष्टों का अहसास तक न हुआ। अति हर चीज की बुरी होती है। मेरे जैसी विभिन्न व्याधियाँ, उसी अति का परिणाम हैं। मैं प्रकृति के बदले का माध्यम हूँ। प्रकृति अपना बदला विभिन्न रूपों में लेती है। कभी बाढ़, कभी भूकंप, कभी सूखा तो कभी अतिवर्षा। ये प्राकृतिक आपदाएं नहीं हैं। यह प्राकृतिक प्रतिशोध है। इंसान को इस प्रतिशोध से डरना चाहिए क्योंकि प्रकृति ने उसे बनाया है, उसने प्रकृति को नही। प्रकृति जब चाहे उसके वजूद को समाप्त कर सकती है। इसलिए इंसान को कभी अपना दायरा नही भूलना चाहिए। यदि वह ऐसा करता है, चाहे किसी भी रूप में ‘अनियंत्रित जनसंख्या हो या प्रदूषण या प्राकृतिक संसाधनांे का दोहन, तब प्रतिशोध के द्योतक के रूप में मेरा जन्म होगा, या मेरे जैसों का जन्म होगा। इन बातों को समझने एवं इनसे सबक लेने का यही उचित समय है। यही समय है अपनी प्रकृति के प्रति अनुगृहीत होने का। 
इस कठिन समय पर प्रकृति के महत्त्व को समझते हुए सुरक्षित रहने का प्रयास करें। मुझसे बचना है, तो मेरी इन बातों पर गहनता से विचार करना होगा। कुछ समय बाद, मैं तो चला जाऊँगा, पर जो हृदयविदारक छाप देकर जाऊँगा, उसे याद रखना। यदि मेरी दी गई सीखों की दिशा में उचित प्रयास नही किए गए, तो याद रखना, मैं फिर किसी दूसरे रूप में वापस आऊँगा। भूलना नहीं ‘मैं हूँ कोरोना’।