हर्ड इम्युनिटीः सामूहिक नरसंहार
June 11, 2020 • Neeraj Tomar

कोविड-19 के कारण हुए लंबे लाॅकडाउन के उपरान्त जून 2020 से केन्द्र सरकार ने अनलाॅक-1 की घोषणा कर दी। सभी राज्य परिस्थितियों के अनुसार अपने-अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। तदनुसार राज्य सरकारों ने अपने-अपने राज्यों को अनलाॅक करना आरंभ भी कर दिया है। कुछ तर्क इसके समर्थन में इस प्रकार हैं कि लंबे समय तक लाॅकडाउन देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। देश की अपनी बाध्यता है कि मरीजों का आंकड़ा पाँच सौ से दो लाख से अधिक होने के बावजूद अब देश अनलाॅक हो रहा है। 
सरकार का यह निर्णय अर्थव्यवस्था और देशवासियों में से किसे बचा पाएगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा परन्तु जो निर्णय कोरोनाकाल में लिए गए, उनकी विवेचना करना अति आवश्यक है। कदाचित इस समस्या का कोई उचित हल ही निकल आये।
जनवरी माह में कोरोना ने भारत में सर्वप्रथम दस्तक दी थी। उस समय शायद इसकी इस विकरालता का किसी को भी अनुमान न था। एक आशा, भारतीय वातावरण एवं तापमान से भी थी कि तेज़ धूप एवं असहनीय गर्मी भारत में इसे शीघ्र ही नष्ट कर देगी। परन्तु ‘अनुमान’ से मिले धोखे ने भारतीय नक्शे को रंक्तरंजित कर दिया। 24 मार्च से आरंभ हुए 21 दिन के लाॅकडाउन के परिणाम सुखद न थे और फिर शुरू हुआ लाॅकडाउन बढ़ाने का सिलसिला। लाॅकडाउन अर्थात् सबकुछ थम जाना। देश, व्यवस्था, व्यापार सबकुछ और इसी से आरंभ होती हैं चुनौतियाँ। सर्वप्रमुख कोराना के प्रसार को रोकना। दूसरी, थमे देश की अर्थव्यवस्था संभालना और तीसरी देशवासियों के भय को कम करते हुए उनका विश्वास जीतना। उन्हें भरोसा दिलाना कि ‘वे’ जिन्हें देश की जनता ने इस विश्वास के साथ चुना है कि ‘वे’ उनकी मुसीबत में उनका सहारा बनेंगे, ‘वे’ उनके भरोसे को कायम रखते हुए उनकी व्यवस्था अवश्य करेंगे। 
भारत में दो अन्य समस्याएं भी है- एक जागरूकता का अभाव, दूसरी अनुशासनहीनता। ये दो वे समस्याएं है जिन्हें मजबूत सरकारी तंत्र एवं योजनाएं उन्मूलित कर सकती हैं। और यदि ये समाप्त हो जाएं तो निश्चित रूप से बहुत सारी समस्याएं स्वतः ही अदृश्य हो जाएंगी। तबलीगी जमात एवं सड़कों पर दौड़ती मजदूरों की भीड़ भी, इन्हीं दो समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए नियंत्रित की जा सकती थी। अनुशासन मात्र जनता पर लागू नही होता। यह सर्वविदित है कि जनता से अनुशासन की अपेक्षा कर, योजनाओं को ढुलमुल तरीकों से लागू करके, किसी सकारात्मक परिणाम की अपेक्षा करना मूर्खता है। सरकारी योजनाओं को लागू करने के लिए पहले सरकारी तंत्र को स्वतः पूर्ण रूप से अनुशासित एवं ईमानदार होना होगा। यदि इस स्तर पर कोई चूक रहती है, तो निश्चित रूप से सभी प्रयास असफल हो ही जाएंगे। प्रथम लाॅकडाउन की असफलता इसी अनुशासनहीनता का परिणाम है। 
सरकार के अनुसार, लाॅकडाउन के कारण भारत में मृत्यु दर अन्य देशों की अपेक्षा कम है। क्या मृत्यु को तुलनात्मक रूप से देखना निंदनीय नही है? यदि प्रथम लाॅकडाउन को अत्यधिक कड़ाई से लागू किया जाता तो क्या यह आंकड़ा और अधिक कम नही हो सकता था? मजदूरों का इस प्रकार पलायन रोक, उनकी उचित व्यवस्था उसी स्थान पर की जाती, जहाँ वे रह रहे थे। संभवतः इसमें सरकार का खर्च भी अपेक्षाकृत कम होता और कोरोना के विस्तार को भी रोका जा सकता था। साथ ही विदेशों से आने वाले लोगों को भी पूर्णतः लाॅक करते हुए, देश की सीमाओं को बंद कर दिया जाना चाहिए था। इसी प्रकार राज्य स्तर पर राज्य की सीमाओं को और फिर जिला स्तर पर जिलों की सीमाओं को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए था। यह लाॅकडाउन कफ़्र्यू की भांति होना चाहिए था। तत्पश्चात् कोरोना निरीक्षण/जांच आरंभ की जाती एवं अन्य मेडिकल आवश्यकताओं की आपूर्ति की जाती। दैनिक आवश्यकताओं की आपूर्ति भी निश्चित योजनाएं बनाकर की जानी चाहिए थी, जिससे अफरा-तफरी न मचे। परन्तु मजदूरों का इतना निर्मम पलायन और उस पर सरकारी मलहम, ‘सहायता की राजनीति’ अधिक प्रतीत हो रही थी। साथ ही ऐसा लग रहा था कि एक के बाद एक लाॅकडाउन, मानो सरकार बस कोरोना से ही अपेक्षा कर रही हो कि वह स्वतः ही चला जाए। इसी बीच चलता रहा राहत पैकेजों का बंदरबाँट सिलसिला। सरकारी विभागों के निजीकरण की ओर बढ़ते कदम। आखिरकार लोग ‘कोरोना के प्रकोप’ में व्यस्त जो थे। 
निश्चित रूप से कुछ चुनौतियाँ अप्रत्याशित भी थी। परन्तु मुसीबत से निपटने के लिए अनपेक्षित परिस्थितियों की तैयारी पहले की जाती है। इसीलिए ही तो कोई देश नेता चुनता है। किसी परिवार का मुखिया अपनी इस भूमिका को जितनी कुशलता से निभाता है, वह परिवार उतना ही अधिक प्रगति करता है। देश के मुखिया से भी यही अपेक्षा की जाती है। अपनी इसी कुशलता के कारण ही तो वह विशिष्ट होता है। परन्तु यदि वह विपरीत परिस्थितियों को संभालने की योग्यता नहीं रखता, तो वह मुखिया होने का भी हक़दार नहीं है। जनहित में उसे त्यागपत्र दे देना चाहिए।
जून से आरंभ हुआ ‘अनलाॅक’ इस असफलता के दोषी को अपनी अयोग्यता स्वीकार करने एवं जनहित में फै़सला लेने के लिए आमंत्रित कर रहा है। इस विकट स्थिति में लिया गया अनलाॅक का निर्णय ‘सामूहिक नरसंहार’ की ओर संकेत कर रहा है। देश के पालनहार कहते हैं कि देश को कोरोना के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए, परन्तु सच्चाई यह है कि अपर्याप्त मेडिकल सुविधा एवं डूबती अर्थव्यवस्था की नैया में, अब देशवासियों को कोरोना के साथ मरने की आदत डालनी होगी। उच्च स्तरीय मेडिकल सुविधाएं, उच्च स्तरीय लोगों के लिए संरक्षित है। अतः आम आदमी का उनकी ओर ललचाई नज़रों से देखना व्यर्थ है। हर्ड इम्युनिटी के नाम पर लोगों की बलि चढ़ाकर, सरकार अपनी पूजा सम्पन्न कर, कोरोना से मुक्ति अवश्य पा जाएगी। वैसे भी कोई आपदा या विपदा ही तो सरकार को पौ-बारह करने के अवसर प्रदान करती है।
बहरहाल, सभी देशवासी आत्मनिर्भर हो, अपने जीवन की रक्षा करें। सजग रहें, सुरक्षित रहें।