अयोध्या में राम मंदिर का भव्य शिलान्यास,पूजन, श्रद्धा और राजनीति का मिलाजुला समागम
August 6, 2020 • Sufi Wajid

 

 उत्तर प्रदेश !भगवान श्री राम की नगरी अयोध्या  में 5 अगस्त को श्री राम मंदिर शिलान्यास का भव्य समारोह हुआ, इस अवसर पर मंदिर के निर्माण का शुभारंभ विधिवत पूजा, आरती के साथ किया गया। भक्तों के साथ मीडियाकर्मी भी इस ऐतिहासिक क्षणों के गवाह बने। शिलान्यास समारोह में  आकर्षण का केंद्र बने देश के  माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो इस ऐतिहासिक पावन अवसर पर अपने ही  अंदाज़ में पूजा अर्चना करते नज़र आए और शिलान्यास में चांदी की ईंट रखकर मंदिर निर्माण का शुभारंभ करवाया।
किन्तु,यह सब किसी राजनीतिक उथल पुथल से ज़्यादा कुछ नहीं था, ऐसा सनातनी बुद्धिजीवी वर्ग और राजनैतिक पंडितों का मानना है,
परशुराम पवित्र हृदय में विराज करते हैं उनको क्या आवश्यकता आन पड़ी इतने विशालकाय आंगन, परिसर और प्रांगण की, जिनका जीवन सहज और सरल रहा हो, जीवन का अधिक समय वन में व्यतीत किया हो, सम्पूर्ण जीवनकाल मानव परोपकार को समर्पित कर दिया हो,भला उनको इस सबकी क्या लालसा थी,श्री राम तो ब्रह्मांड  के विधाता थे उन्हें सत्ता का लोभ कभी नही रहा।
 भगवान राम की जीवनशैली का अनुसरण लेश मात्र भी होता तो सभी को सम भाव और समदृष्टि से आंकलन किया जाता और कोई छोटा बड़ा नहीं होता, सब उसी परम पिता परमात्मा की संतान, और सब बराबर हैं।
परन्तु, इस तरह का आयोजन करके कुछ और ही मानसिकता को दर्शाता है, जहां सिर्फ महंत, पंडे, पंडित,पुरोहित और पुजारी का काम हो वहां राजनैतिक नेताओं का क्या काम, फ़िर भी कुछ तो है जो अल्पसंख्यक समाज को सोचने पर बाध्य करता है, सभी धर्मों वर्गों,जातियों के लोग आराध्य  भगवान श्री राम को मानने वाले हैं उनके प्रति सम्मान का भाव रखते हैं पर देश में इस तरीके का और व्यापक पैमाने पर धार्मिक आयोजन कोई ग़लत नहीं है पर जब समूचा भारत एक जानलेवा बीमारी से ग्रस्त है, लोग जान गवां रहे हैं वहीं ऐसे धार्मिक कम राजनेतिक ज़्यादा दिखने वाले कार्यक्रमों को होना कदापि उचित नहीं।

रही बात देश की अर्थव्यवस्था की जो  अपंग जान पड़ती है, बेरोज़गारी का स्तर बढ़ चला है, किसान और बधुआ मजदूर खून के आंसू रो रहा है,आम जनता जो बार बार अपने बैंक खाते टटोलती नज़र आती है कि भगवान ने हजारों करोड़ की बात की थी वो भी मीडिया के समक्ष, उनका ही सही, पर कहा था,क्या वही सच हो जाएं, पर नहीं हुआ लेकिन उम्मीद में भी अपना मज़ा है और यही है जिसमें संसार चल रहा है और चलता रहेगा।
बुद्धिजीवी लोग जो स्थिति और परिस्थिति के विश्लेषण के अध्धयन से भली भांति परिचित हैं और कुछ अपने लेखन के माध्यम या किसी मंच पर आकर संबोधन भी करते हैं तो उन पर देशद्रोही यानी एंटी नेशनलिस्ट का ठप्पा लग जाता है 
अब रहा पत्रकारों की चाटुकारिता की बात,इस मंडी में जब जब पत्रकारों की बड़ी खेप आयी या मीडियाकर्मियों की संख्या बढ़ी तब तब तब पत्रकारिता बेचारी सी नज़र आईं, एक अच्छा पत्रकार जो अपने काम की जानकारी रखता है, अपने व्यवसाय में पारंगत और उसके संस्कारी तत्वों को बखूबी समझने का हुनर रखता हो वह या तो मजबूरी में संस्था के लाला की नौकरी कर रहा है या फ़िर अपने बाद के रास्ते तय करने की जुगत में लगा है क्यूंकि खबरी चैनलों के मालिक लोग सरकार के नतमस्तक होते हैं तब सच्चे पत्रकारों की भी पत्रकारिता सड़क पर दिखाई पड़ती है।
अब बात करते हैं भारत में आपदाओं की  जहां एक तरफ करोना महामारी,वहीं दूसरी ओर चीन के चढ़ते तेवर, बिहार में बाढ़ कहर, मज़दूर और किसान का हर रोज़ का मरना,दिन में न जाने कितनी बार सवाल है कि सरकार उनकी सुध लेने में इतनी सुस्त क्यों हो रही है?
 वही दूसरी ओर सत्ता हथियाने के लिए जहां एक तरफ बनी बनाई सरकार को गिराने की भरपूर कोशिश और विधायकों की खरीद फरोख्त में कोई भी कोताही नहीं दिखती, सवाल फिर आता है कि इतना चंदा कहां से बन पाता है यह भी बड़ा सवाल है।क्या सरकार का दायित्व नहीं है कि इन गरीबों,वंचितों और किसानों की आर्थिक स्थिति में थोड़ा सुधार लाया जा सके, उनको भी दो जून की, सूखी ही सही, रोटी नसीब हो, आखिर इस देश मे गरीब की मरण स्थिति क्यों है?
यहां पर हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी का नारा 'सबका साथ सबका विकास' बेमानी हो जाता है, अगर थोड़ा हिन्दू मुस्लिम और मंदिर मस्जिद से ऊपर उठ कर फैसले लिए जाएंगे तभी एक नए भारत का उदय होगा जो  विश्व गुरु के रूप में दिखाई देगा
आज अगर किसी देश के प्रधानमंत्री को ही भगवान मान लिया जाए तो उस देश का विनाश सुनिश्चित है जो धरातल पर प्रतीत भी हो रहा है और कुटुंब के मुखिया सिर्फ वोट बैंक को तरजीह देने  में महारत रखते हैं !